Thursday, May 14, 2015

ईश्वर

जन्म लेना चाहती हूँ
नम्रता के तल पर....
विलिन आकाश की भंगिमाओं में शामिल
तुम्हारा चेहरा नही दिखता........
ईश्वर.......

श्री..........

एक भाषा जन्म लेती है

आंखें खोलती हैं पत्तियां
अब उमस भरी रातों के उपर सोकर
तलाशती हैं 
दाग वाले बिछौने और धूप से सने चुम्बनों के निशान
कुछ रात के सीने पर
और कुछ
जो जा चुके थे आत्मा की संकरी गली तक...

कोई तारा बहकता है अपनी ही बातों में
निष्पाप
सूखे प्रेम के स्वांग के साथ....

एक भाषा जन्म लेती है
जिसे समझने के लिये
हम और करीब हो जाते हैं सुबह.......

यह आत्माओं के शहर में किस हद तक दीवानगी छूती है जीभ से हर निशान.......ढका हुआ......

श्री............

श्रीबीज

कुछ यूं भी रिक्त होता हूँ
रक्तबीजों से...
जब चुनता हूँ
श्रीबीज
तुम्हारी करूणा के...
ताकि
समाहित हो सकूं
सृष्टि के विस्तार में
देर तक सुनता रहा तुम्हें
तुम्हारे जाने के बाद
बुदधम
शरणम
गच्छामि.....
श्री.........

मेरा आध्यात्मिक प्रेमी

विराम
है समाप्त....
मेरे उष्मा केन्द्र
जाग्रत होना चाहते हैं तुमसे....
केवल तुमसे....
मेरा आध्यात्मिक प्रेमी
मुस्कुराता है
एक प्राचीन सत्य के साथ....
उसके भोग में
कोई अंश नही दुनिया का....
मैं भी
उसकी आत्मा के सीने पर
पैर रख
उतारती गयी....
अपनी
मासूमियत
तर्क
बिखराव
स्मृतियां
संबंध
और देह.......
बहुत समय बाद वो पूरे चांद की रात थी.......
श्री.........

लाल रोशनी

अंबर का दरवाज़ा खुला.....
एक नीला तारा
मेरी जमी रातों की दहलीज़ पर उतरा.....
सोते अधखुले होंठों पर
धूप का गीला मौसम रख
रात भर
मुझे अपनी चादर में समेटता रहा.....
हथेलियां नम थीं
खोई रही दुआ मांगती.....
आंखें खुलतीं
तो देख पाती उस मुराद का चेहरा
मद्धम मद्धम जो घुल रहा था मुझमे....
उस रात सब लाल था....
लाल रात
लाल रोशनी
लाल बिस्तर
लाल अंगडाई
और......................

श्री.......

रिक्तता

मैं .......
रिक्त होता हूँ तुमसे
जब-जब तुम छलती हो मुझे....
जितनी बार रिक्त होता हूँ
उतनी बार 
एक नया रहस्य खुलता है तुम्हारा.....
क्यूं ना आज
सारा रहस्य पी लूं
तुम्हारी छोटी उंगली चूस कर
और भर दूं तुममे वो रहस्य
जो मैने छुपा रखा था
जब मैं केवल एक मनुष्य था.........
आओ....
फिर एक छलना करो मुझसे.....
और भर दो मुझे रिक्तता से
ताकि
मैं पी सकूं
तुम्हारी एक-एक बूंद.........

श्री......

नाभि के पास एक चंद्रमा



तुम्हारी नाभि के पास
एक चंद्रमा है काला...
उस अनंत सौन्दर्य की गरिमा में
मैं उसे छू कर
निर्वाण नही देना चाह्ता......
तब तक दृश्य बनाता रहूंगा
जब तक एक भी सांस का
आरोह-अवरोह भिन्न है.....
जब लयबद्ध हो जायेगी
सृष्टि
तुम्हारे अंतस के संगीत से....
जान लोगी मेरा अज्ञात
और
पांव रख लोगी
मेरी गुफा में.....
तब
मैं प्रवेश करुंगा
तुम्हारी नाभि में..........................
श्री...........