मुग्ध प्रवंचनायें......निर्जीव दीवारों में बंद मौन सभायें....आंखें.....अपनी-अपनी प्राचीन वेदनओं में मुंदी...
पात्र अमृत का उतना ही दूर
जितना दूर एक पवित्र किताब से मनुष्य......
घंटे बजते हैं
स्थगित आत्माओं की चीत्कार में...
खून रिसता है......धीरे-धीरे.... ज़मीन तक......
एक मानवीय मुस्कान
टंगी रह गयी होंठों पर.......
पीडा की लकीरों में सोई..........
चुभती हैं कीलें यीशू की
आज भी.......
सो रहे हैं मनुष्य प्रार्थनाओं में......
अब तक भी सूली से नही उतारा
यीशू को ........
श्रद्धा से भरी सभाओं में से........
किसी एक भी हाथ ने.........
श्री............
देह से जुडी स्मृतियाँपरिष्कृत करती है आत्माकितनी ही तहें खुलती हैंएक के बाद एक.....
हर युग के घाट पर
अपना कुछ हिस्सा छोड़ती हुई......
घाट..... स्नेह का
प्रेम का
मृत्यु का......
और उस सम्मोहन का भी
जिसे बांधा था
उस असीमित रात में
और
खोजी थी एक नई लिपि......
स्वप्न सम्भोग की.......
तपता रहा संताप... जीवन और मृत्यु के बीच
जपते रहे नाम ........ एक दूसरे का
छूते रहे हर हद आत्मा की
छलते रहे अपने ही भ्रमों को..........
गिरती रही रश्मियां नई सुबह की
जन्मते रहे जुगनु
अदृश्य सम्भोग के...........
चुभता रहा अपराधबोध दिन बनकर
रात का सम्मोहन.........
पाते रहे मृत्यु छोटे-छोटे टुकडों में............
श्री............
जया जादवानी जी की कहानी 'घाट' से प्रभावित कविता.......
बूढा होता एक द्वीप.....लघुतम को समझतेस्वीकारतेसम्मान के हाथों पछताते.......
पाप को मरियम के सामने बुदबुदाते......
अकेले में रोते
स्थिर होते
काठ की इच्छाओं को परखते.....
स्वीकार करते
कि हर लघुतम का बोध है अनकहा आख्यान.......
किसी छिपी इच्छा से ही
बूंद और सागर के फासले को जाना जा सकता है
और किसी छिपी इच्छा से ही
मुक्त हुआ जा सकता है ....... पाप से..........
श्री..............
जिस्म की मिट्टी में गूंधीएक दोपहरसुन रही थी लोबान का संगीत रेशे-रेशे से......कामना के रंगों से रंगी जिज्ञासा
हर शह को खोजने की अभिलाषा
हर आह को पीने की चाहत
और संवाद............
संवाद जिस्मों की मिट्टी का
खुदा ने भी सुना..
उन दो हाथों की प्रार्थनाओं के बीच
अपने निर्माण पर हैरान था........
त्वचा रिसती रही, रिसती रही
बहाती रही मुक्ति......
जिस्मों के संवाद पर
कायनात ने एक गीत रचा
और रख दिया
ह्व्वा की कोख में......
मिट्टी मिल गयी मिट्टी में
संवाद संवाद में
और
प्रार्थना प्रार्थना में…...
बचा क्या था
क्या अब भी नही समझे..............
श्री..............
एक रंगरेज़ देखाचिथडों में....रंग रहा थादिवारों पर संघर्ष की रोटी.....श्री......
प्रेम की भी चेतना होती है और तब-तब परिष्कृत होती है जब—जब वो निर्दोष होती जाती है। हर एक्ट के बाद....यह भी तब जब प्रेम के आकाश पर हमारी रुह छील चुकी होती है खुद को भी।प्रेम और ईश्वर में मुझे कोई अंतर नही नज़र आता..बेशक देह एक टूल और शब्द औपचारिकता का रिवाज़ हैं लेकिन यह भी क्या राहत नही अपने होने की.....तुम्हारे लिये.....तुम्हारे ही शब्दों की धरती पर कदम रखती हूँ हमेशा.....
चिन्ह मात्र का भेद नहीं....
खुलती हैं बेड़ियाँ
अभद्रता की....
शिष्टाचार में जागती है आत्मा
जब छूते हैं तुम्हारे पाँव
मेरे रोम-रोम का आहवान
मेरे इष्ट......
और तब भी
जब मेरा प्रेमी चूमता है
प्रार्थना में उठी मेरी हथेलियों को......
पीडा उठती है प्रसव की...
जानती हूँ....यह मध्यस्थता है
देह और आत्मा की......
हज़ारों तारे टूटते हैं एक साथ
जब-जब जन्मती है कृतज्ञता
मेरे प्रेमी और इष्ट के बेपनाह प्रेम से....
यह जागृति एक नशा है प्रेत छायाओं का
जिन्हें यथार्थ के हाथ
स्वप्न के श्रद्धालुओं से ले आते हैं स्पर्श की रोशनी में
और समय ने यहां भेजा तुम्हें आज
मुझे……संबंध बताने को
ईश्वर और मोमबत्तियों का.........
श्री......................