रचना हूँ..
तुम्हारे देवतत्व के उच्चतम शिखर की
जो बिखरा पडा है
मेरी आत्मा के सिरहाने....
एक सुराही है..
जिसे बरसों से भर रखा है मैंने
उस रहस्य से
जिसमे मैं तब प्रवेश नही करती
जब रजस्वला होती हूँ.....
नई होकर
जब लौटती हूँ तुम्हारे पास
तो अपनी धुली चेतना के धागों से
एक बार फिर
बुनती हूँ
वही प्राचीन रहस्य.....
जिसे तुमने निगल लिया था नींद में.....
श्रृंगार किया था मेरा
और नाम दिया था मुझे...
सजनी.........
श्री.......
तुम्हारे देवतत्व के उच्चतम शिखर की
जो बिखरा पडा है
मेरी आत्मा के सिरहाने....
एक सुराही है..
जिसे बरसों से भर रखा है मैंने
उस रहस्य से
जिसमे मैं तब प्रवेश नही करती
जब रजस्वला होती हूँ.....
नई होकर
जब लौटती हूँ तुम्हारे पास
तो अपनी धुली चेतना के धागों से
एक बार फिर
बुनती हूँ
वही प्राचीन रहस्य.....
जिसे तुमने निगल लिया था नींद में.....
श्रृंगार किया था मेरा
और नाम दिया था मुझे...
सजनी.........
श्री.......

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