Wednesday, January 21, 2015

मैं इतिहास बन गया..

पैरों की हरी नसों की 
इबारतें पढते 
तुम्हारी पाजेब और बिछुओं की भाषा को सुना..
न जाने क्यों
माथे की लाल बिंदी शरमा गयी..
मैनें उसे पास आने का संकेत दिया..
कानों में झूलते बुंदे मुझसे उलझ पडे
मैंने तांबाई रंग को सीने में भरा..
भाग्यरेखा बताती तुम्हारी हथेली पर अदृश्य सावन रखे..
खिडकी खुली थी
और चांद झुक कर भीतर की दीवार पर जम गया..
एक थमी सी धरती की कथई रोशनी को
सुबह तक मंत्रों में ढाला ...
न जाने क्यों तुम्हारी पीठ नाराज़ हो गयी
और तुम्हारी आंख से
एक आंसू मेरी सफेद कमीज़ पर गिर गया....
रात भर तुम्हें पढते-पढते
मैं इतिहास बन गया.............

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