उस रात....
मैं कितनी बेचैन थी
जब तुम दर्शन समझा रहे थे
मैं उलझ रही थी तुमसे क्रोध में
और तुम मुझसे प्रेम में...
कि कोई दर्द का रेशा मेरा हाथ लग गया तुम्हारे
बहुत देर तक खामोशी से बही थी आंखें
सोचा...
दीखता कहाँ है यह..
पर तुमने न जाने कौन सी तार से जमा कर लिये सब आंसू
मैं सो गयी दर्शन में उलझते
तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर...
कितनी देर तक
तुमसे उगा अर्धनारीश्वर
मेरे उलझे बालों को सुलझाता रहा........
तब से जी रही हूँ...............
श्री....
मैं कितनी बेचैन थी
जब तुम दर्शन समझा रहे थे
मैं उलझ रही थी तुमसे क्रोध में
और तुम मुझसे प्रेम में...
कि कोई दर्द का रेशा मेरा हाथ लग गया तुम्हारे
बहुत देर तक खामोशी से बही थी आंखें
सोचा...
दीखता कहाँ है यह..
पर तुमने न जाने कौन सी तार से जमा कर लिये सब आंसू
मैं सो गयी दर्शन में उलझते
तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर...
कितनी देर तक
तुमसे उगा अर्धनारीश्वर
मेरे उलझे बालों को सुलझाता रहा........
तब से जी रही हूँ...............
श्री....

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