Thursday, January 22, 2015

अनहद नाद

तीन ताल
सात सुर
मृदंगना का स्वर
और काम का मोहक सौंदर्य
सब दहक रहा है तुम्हारे तांडव में
देख रही हूँ तुम्हें
कैलाश को थरथराते....
पर देखो
मैंने भी खुद को ढाल लिया
उसी रंग में
जिस रंग में तुम्हारी आंखें हैं स्थिर
मेरी अधमुंदी कामनाओं को पीती हुईं...
सप्तपदी का धर्म निभाना नहीं आता मुझे
मैं बस प्रेम में हूँ तुम्हारे...
यह सात बूंदे विष की तो मैंने भी पी हैं
तुम्हारे अस्तित्व से खुद को सींचा है...
तुम्हारी मुद्राओं को स्थापित किया है अपने वसंत्तोसव पर
अनंतता के बोध में
यह प्रथम कामरात्रि है
मैं खो चुकी हूँ सब, जो था मेरा
सुन रही हूँ अनहद नाद...
ओ मेरे सनातन.........
श्री....

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