एक सौ आठ स्वप्न थे पूरे
जो देखे मैंने अकेले
प्रयाग धाम पर खडे हुए..
कोई भी स्वप्न मेरी धमनियों को तृप्त नहीं कर पाया
प्रयाग की सीढियों पर बैठे
मैंने कई प्रार्थनायें समर्पित की अपने अज्ञात को
मगर हर आवाज़
हर प्रार्थना
समूचा अस्तित्व कण
लौट रहा था...बार बार
क्योंकि उनमें से एक भी स्वप्न
तुम्हारे गले को छूकर नहीं आया था........
नीलकंठ.......
जो देखे मैंने अकेले
प्रयाग धाम पर खडे हुए..
कोई भी स्वप्न मेरी धमनियों को तृप्त नहीं कर पाया
प्रयाग की सीढियों पर बैठे
मैंने कई प्रार्थनायें समर्पित की अपने अज्ञात को
मगर हर आवाज़
हर प्रार्थना
समूचा अस्तित्व कण
लौट रहा था...बार बार
क्योंकि उनमें से एक भी स्वप्न
तुम्हारे गले को छूकर नहीं आया था........
नीलकंठ.......

No comments:
Post a Comment