एक निर्दोष कविता.......
कविता की मेरी अपनी आत्मा है
अपनी गंध और नशा
कच्ची शराब सा..
सामने की खिड़की
से
दिखाई देती रात से अलग..
हालाकि रात का भी अपना सौंदर्य है
पर मैं अपनी कविता में
कोई आंसू नहीं एकत्रित करती
न धूप न बारिश न रंग
और न कोई आवाज़..
आवाज़ें कोलाहल को जन्म देतीं हैं
मुझे ज़िंदगी का यह कोलाज पसंद नही..
न ही पसंद है ढेर सा पानी और मिट्टी..
दरअसल मेरी अपनी कोई विशेष चाहत अब बची ही नही मुझमें
ये नसीहतें मेरे पिता ने दीं
कि चाहतों को कैसे सिमिट्री में देखतें हैं
कुछ सुंदर कलियों और रोती हुईं चिडियों के साथ...........
वर्षों बाद अब जब सब बदल चुका
और मैं भी परिप्क्व औरत बन चुकी
थोडी भारी और बिना रंगे नाखूनों वाली..
तब मैंने एक दिन देखा
कि अब मैं बीच रास्ते पहुचं चुकी
जहाँ से दुनिया आपकी आत्मा से दूर दिखाई देती है
यह एक डर था...
एक भूलभूलेया थी...
अपने को खोने की...
उस पल मेरी आंखे बंद थीं
और अब बस यह एक बार होने के लिये था..
जब आंखे खोली तो देखा
मेरे हाथों में एक कविता थी
बिना रंग, बिना धूप, बिना आंसू और बिना आवाज़ के..
लकिन उसमें एक आत्मा थी..
बिल्कुल निर्दोष .............
कविता की मेरी अपनी आत्मा है
अपनी गंध और नशा
कच्ची शराब सा..
सामने की खिड़की
से
दिखाई देती रात से अलग..
हालाकि रात का भी अपना सौंदर्य है
पर मैं अपनी कविता में
कोई आंसू नहीं एकत्रित करती
न धूप न बारिश न रंग
और न कोई आवाज़..
आवाज़ें कोलाहल को जन्म देतीं हैं
मुझे ज़िंदगी का यह कोलाज पसंद नही..
न ही पसंद है ढेर सा पानी और मिट्टी..
दरअसल मेरी अपनी कोई विशेष चाहत अब बची ही नही मुझमें
ये नसीहतें मेरे पिता ने दीं
कि चाहतों को कैसे सिमिट्री में देखतें हैं
कुछ सुंदर कलियों और रोती हुईं चिडियों के साथ...........
वर्षों बाद अब जब सब बदल चुका
और मैं भी परिप्क्व औरत बन चुकी
थोडी भारी और बिना रंगे नाखूनों वाली..
तब मैंने एक दिन देखा
कि अब मैं बीच रास्ते पहुचं चुकी
जहाँ से दुनिया आपकी आत्मा से दूर दिखाई देती है
यह एक डर था...
एक भूलभूलेया थी...
अपने को खोने की...
उस पल मेरी आंखे बंद थीं
और अब बस यह एक बार होने के लिये था..
जब आंखे खोली तो देखा
मेरे हाथों में एक कविता थी
बिना रंग, बिना धूप, बिना आंसू और बिना आवाज़ के..
लकिन उसमें एक आत्मा थी..
बिल्कुल निर्दोष .............

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