Thursday, January 22, 2015

शब्द

शब्द इच्छा नहीं रचते....
शब्द इच्छा रचते हैं और
दूरियां प्रेम..
कितने बेढंगे तरीके से सोचती हैं 
आत्मा की इमारतें..
प्रेम के परे जाना, देह से छूटा कोई बुलबुला नहीं..
प्रेम – एक गुमनाम चिट्ठी और उस पर लिखा सही पता
या कुछ ऐसा ही पागलपन लिये
चलता है डाकिये के साथ..
हम दोष देते हैं
वो हंसता है..
क्योंकि शब्द केवल इच्छा बताते हैं....
रचते नही....
श्री
....

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